Wednesday, May 22, 2013

Monday, August 27, 2012

पहाड [दशरथ मांझी के जीवन पर आधारित उपन्यास अंश]

२४

आगे की चट्टाने कैसी हैं और उन्हें कैसे काटा जाय सोच भी नहीं पाए दशरथ कि पूरे बिहार पर अकाल की छाया मड़राने लगी। गांव में जिन लोगो के पास रेडियो था उनके दरवाजे पर सुवह शाम समाचार के समय अकाल की सूचनाएं सुनने वाले लोगों की भीड लग जाती । लोगों की जुबान पर चर्चा का बस एक ही विषय था अकाल। सूचना के साथ अफ़वाहो ने भी जोर पकड लिया था और यह तय कर पाना मुश्किल था कि घटनाऒ भीड में कौन सी सूचना है और कौन सी अफ़वाह। इन हालातों में दशरथ ने पहाड़ काटने का काम बन्द कर दिया क्योकि पहाड़ से अधिक गांव के लोगों के जिन्दा रहने की जरूरत उनके जेहन में घर कर गई थी ।

बिहार में लोग खेती को सरगसरा कहते थे। मतलब आसमान से अगर बारिश होगी तो फ़सल होगी नहीं तो नहीं होगी। पिछले साल बारिश कम हुई थी और फसल आधी से भी कम हुई । लोगों को उम्मीद थी कि अगले साल अच्छी बारिश होगी और फसले हो जाएगी तो गए साल की सारी कमी भरपायी हो जाएगी और जीवन पटरी पर आ जाएगा। मगर दूसरे साल तो एक दम ही बारिश नहीं हुई । खेत एक बूंद पानी के लिए तरस कर रह गए।इलाके के जितने भी गड्ढे पोखर थे सब पूरी तरह सूख गए थे और सूखे कीचड की पपडी के बीच दरारे बहुत भयानक लग रही थी। गांव में जितने पुराने फ़लो के पेड थे या तो सूख गए थे या सुखने के कागार पर थे। आसमान और हवा के सहारे मौसम की भविष्य वाणी करने वाले किसान कह रहे थे कि यह दौर अभी लम्बा चलेगा क्योंकि दिन में बादल आसमान में छाए रहते है और रात में आसमान साफ़ हो जाता है तथा पुरवा हवा भी लगातार चल रही है जो अकाल का पहला लक्षण है। जिन किसानो ने कहीं रोपाई की थी , वे अब खेत में रोपे गए धान को छिल छिलकर मवेशियो को खिला रहे थे क्योंकि उनके लिए कही चारा नहीं बचा था। धान होने से तो रहा कम से कम मवेशियों की जान तो बच जाए। खेतों में लहलहाती फ़सलों की जगह बडी बडी दरारें पडी थी। कई जगह खेतॊं में मरे हुए मवेशी पर मंडराते, मांस नोच नोच खाते गिद्ध दिखाई देते जिनकी कुतो के साथ जंग चलती। कई लोगों के घर तो कई दिनों से चूल्हा नहीं जला । कही कुछ जुगाड़ हो जाता तो लोग बच्चों को भरपेट खिलाते और अपने आधे पेट खाकर संतोष कर लेते। चारो तरफ हहाकार मचा था । 

गलहौर का समाज खेती पर टिका हुआ समाज था । बडे किसानो के घर में थोडा बहुत अनाज था मगर मजदूरों का बहुत बुरा हाल था। मांझी टोल में कोई हल जोतता, कोई चरवाही करता और कोई मजदूरी करता ,सब के सब किसानों की होने वाली पैदावार पर टीके हुए थे और वहीं से उनके जीवन यापन का रास्ता मिलता था मगर जब किसानों के घर फसल ही नहीं आएगी तो वे मजदूरों को काम कैसे देगे। जब काम नहीं देगे तो आय का साधन ही नष्ट हो जाएगा। यह गलहौर गांव की ही नहीं पूरे बिहार में जहां अकाल का तांडव पसरा था की कहानी थी । गांव के सारे कुए सूख गए थे। संतोष था कि मुखिया का कुआ अब भी पानी दे रहा था मगर चरचा थी मुखिया अब उस पर रोक लगाने वाला है। खेती पर आधारित मजदूर परिवार भूखे मरने पर बिवश हो गए थे।

चीजो के दाम आसमान छू रहे थे। गलहौर के कई लोगो को पहली बार इस बात का पता चला कि उनके गांव में मुखिया और बडे किसानो से अलग कोई सरकार नाम की चीज है जो ऐसे आफत के समय में लोगों की मदद करती है। आसपास के गांव में मदद करने वाली कई गाडियां आई थी और लोगों को मुफ़्त मे चावल गुड और कई तरह के समान मिले थे। मगर गलहौर में उसका भी अता पता नही था। जब दशरथ गांव के लोगों के साथ ब्लाक पर गए और शिकायत दर्ज की तो दो दिन बाद राहत की सामग्री लेकर गांव में एक गाड़ी आयी । गाडी के साथ उसके अफ़सर भी आए थे। अफ़सर के सामने मुखिया ने गांव के बाहर लोगों को बुलाकर लाईन में खड़ा कर दिया और बारी बारी से चीजे बाटी जाने लगी। लोगों को लगा कि वे चीजे प्रर्याप्त मात्रा में नहीं है पीछे पहुचते पहुचते खतम हो जाएगी तो वे अपना आपा खो बैठे और लुटपर उतारू हो गए। इसका असर ये हुआ कि किसी को कुछ मिला किसी को कुछ नहीं मिला और आपस में ही लोग लडने लगे।

इस घटना के बाद मुखिया और अफ़सर के बीच जाने कौन सी खिचडी पकी कि राहत का कोई भी सामान आता तो वह गांव वालों के पास आने के बजाए सीधे मुखिया के पास चला जाता। मुखिया उसे अपने कमरे में बन्द कर देता और उन्हें बाटने का समय निर्धारित कर देता लेकिन बाटने के दौर में उसका ढेर सारा हिस्सा अपने ही हड़प लेता ।

इसके कुछ दिन के बाद सामग्री का गांव में आना ही बंद हो गया। राहत सामग्री की गाड़ी ज्यो ही गया से निकालती आस पास के इलाके के लोग गाड़ी को घेर लेते और उसे लुट लेते । किसी को किसी पर भरोसा नहीं रह गया था। लोग दिनो दिन अराजक होते जा रहे थे। लोगों और मवेशियो के मरने की सूचनाए लगातार आ रही थी।  अकेले गलहौर में माझी टोल पासी टोल और दुसध टोली में बारह लोग मरे थे । कुछ मौते उंची जाति के परिवारों में भी हुई थी लेकिन उनकी संख्या काफी कम थी 
राहत सामग्री एकदम से बंद हो गई तो गांव के लोग इसके लिए एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराने लगे । आपसी मतभेद उभरकर इस तरह सामने आ गए कि आपस में मारा पिटी तक की नौबत आने लगी । इन हालातो में दशरथ अकेले आदमी थे जिनकी बात गांव के लोग मानते और खास मसलो पर फ़ैसला इन पर छोड़ देते ।

दशरथ अपने घर में बैठे सोच रहे थे कि लूट के कारण राहत सामग्री की गाड़िया आनी बंद हो गई है। ब्लाक पर चलकर कुछ करना चाहिए ताकि फ़िर से राहत सामग्री की गाडियां ले आई जा सके और लोगों की जान बच सके। कल भी उनका पूरा दिन वही बीता था। ब्लाक पर पूरे इलाके से आए हुए लोगों की भीड़ थी । कुछ ग्रामीणों ने गुस्से में चावल का गोदाम लुट लिया था चारों ओर अफरा तफरी मच गई थी । कोई किसी बात का जबाब देने के लिए तैयार नहीं था। पूरे दिन वे प्रयास करते रहे मगर कोई सफलता हाथ नहीं लगी और वे हारकर वापस चले आए। आज के लिए भी कहीं कोई उम्मीद नहीं थी मगर लगे रहने पर हीं कुछ हो सकता था,सोचकर वे ब्लाक पर जाने के लिए झौरी और छेदी का इंतजार कर रहे थे । अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई तो उन्हें लगा कि वे आ गए ,मगर सामने का दृष्य देखकर कांप गए । रमिया पिंजरी को सम्भालते बच्चे को गोद में लिए घर में आ रही थी। पिंजरी दशरथ के पास आयी, अजीब सी कतार निगाहों से उसे देखा और बेहोश हो गई। दशरथ उसे कमरे में ले गए । बिस्तर पर लिटाया, चेहरे पर पानी का छींटा मारा । पिंजरी को होश तो जल्दी ही आ गया मगर वह फुट फुटकर रोने लगी ।बहुत दिनों के बाद किसी ने पिजरी को धान कूटने के लिए बुलाया था। वे गई तो घर में अकेली थी,कहा कि अभी किसी काम में लगी हूं ,शाम को आ जाना। वहां से लौटकर रमिया के साथ पिंजरी घर आ रही थी।

गांव और माझी टोल के बीच थोड़ा सा फासला था जिसमें गैड़ा के खेत थे। गांव वाले कहते कि बाहर के खेतों में फसल न भी हो तो ये गैड़ा के खेत पूरे गांव को खिलाने में सक्षम है लेकिन वे भी इस साल मजबूर हो गए थे। धूप इतनी तेज थी कि खेतो के बीच मोटी मोटी दरारे दिखाई पड़ती और जगह जगह मरे हुए चूहे दिखाई पड़ते । आस पास का इलाका हरियाली से भरा रहता मगर अब चारों ओर सुखापन पसरा था। जहां कोई हरी घास भी दिखाई पड़ती लोग उसे नोच ले आते और थोड़े से चावल में नमक डालकर पकाते ।

रमिया और पिंजरी अपने टोले के पास आयी तो देखा कि जूना की बछिया बाहर खड़ी है। बछिया भले जुना की थी मगर पिजरी रोज उसे कवरा देती थी। बछिया ने पिजरी को  देखा जैसे वह पिजरी से कुछ कह रही हो और देखते देखते जाने क्या हुआ कि खडी खडी लुढ़क गई, उसका जीभ बाहर निकल आया और मर गई।  यह देख पिजरी की सांस टंग गई लगा जैसे वह खुद ही बेहोश हो जाएगी। रमिया ने उसकी बच्ची को सम्भाला और किसी तरह उसे घर लेकर आयी।
पिजरी बिस्तर पर थी। उसका बदन बुखार से गरम हो गया था। छेदी और झौरी दशरथ के साथ ब्लाक पर जाने के लिए तैयार होकर आए तो पिंजरी का बुखार काफी तेज हो चुका था । दशरथ समझ नहीं पाए कि क्या करे जिस हाल में पिजरी थी उसे छोड़कर जाना उन्हें अपराध की तरह लग रहा था। दशरथ को असमंजस में पडा देख पिंजरी ने कहा
मेरी चिन्ता मत करो मैं ठीक हूं
मगर उसका हाल देख दशरथ को जाना गवारा नहीं हुआ। रमिया भाभी ने दशरथ से कहा
तुम जाओ मैं पिंजरी के साथ रहूंगी
रमिया के कहने पर दशरथ को ढाढस बंधा । ब्लाक पर जाना जरुरी था क्योकि सबकी उम्मीदे वही पर टिकी थी। वे पिजरी को काम पर न जाने का निर्देश देकर छेदी और झौरी के साथ ब्लाक पर चले गए।

दशरथ हप्तों से रोज नियम से ब्लाक में आ रहे थे मगर कोई फायदा नहीं हो रहा था। आज एक कर्मचारी उनसे बात करने के लिए तैयार हो गया मगर तभी उसके अफसर ने उसे बुला लिया । दशरथ को यकीन था कि वे अपने गांव वालों के लिए सरकार द्वारा भेजी गई राहत की सामग्री प्राप्त करने में सफल हो जाएगे।

ब्लाक पर इलाके के लोग जुट गए थे और तरह तरह की सूचनाए उनके बीच पसर गई थी। कोई कुछ कह रहा था कोई कुछ । सबके सब अफसरो को कर्मचारियो को गालियां बक रहे थे और राहत सामग्री की चोरी का इल्जाम लगा रहे थे। अखबारों मे रोज ही मरने वालो की खबर छप रही थी ।

दशरथ की निगाह एक ऐसे आदमी पर पड़ी जो वहां रोज दिखाई देता था ।वह जब चाहता, अफसरों के कमरे मे चला जाता और बाहर आ कर लोगों से बात कर पूछता कि उसके गांव में क्या हुआ। दशरथ को उसका चेहरा जाना पहचाना लगा। हो सकता है कि वह आदमी दशरथ की कोई मदद कर सके। किसी गांव का आदमी जब उसे बता रहा था कि कल उसके गांव का एक आदमी अपने कुत्ते को मार कर खा गया। वह उस आदमी का नाम लिख रहा था तभी दशरथ उसके पास पहुंचा। किसी चमत्कार की तरह उसने दशरथ को पहचान लिया ।
आप दशरथ जी हैं ना...याद है आपको। मै आपके पास गया था इन्टरव्यू के लिए, जब आप पहाड काट रहे थे।
वह किसी अखबार का रिपोर्टर था जो एक बार दशरथ के पास आ चुका था और पहाड़ काटने की घटना को अखबार मे छाप चुका था।
दशरथ ने उसको अपने गांव का हाल सुनाया तो वह बोल पडा-लगभग सारे गांव का तो यही हाल है लेकिन घबराईये मत मै आपकी मदद करुंगा, आईये मेरे साथ।
झौरी, छेदी राजबरन और गांव से आये लोग बाहर खड़े रह गए और वह दशरथ केा लेकर बिडियो साहब के कमरे की ओर चल पड़ा । बीडीओ ने मुस्कुरा कर पत्रकार का स्वागत किया और बैठने के लिए कहा। दशरथ पत्रकार के साथ सामने की कुर्सी पर बैठ गये।
इनको पहचानते हैं
बीडीओ ने ना में सर हिलाया
ये गलहौर के दशरथ माझी हैं।
और बात अभी शुरू भी नहीं हुइ कि अचानक गया से कलक्टर का संदेशा आ गया और बीडीओ माफी मागते हुए अगले दिन उन्हें आने के लिए कह कर चला गया। बाहर निकलकर पत्रकार ने कहा
कल आ जाइए मै आपको पूरी सूचना दिलवाउगा और आपके गांव के लिए जो कुछ होगा वह आपको मिल जाएगा।
कह कर पत्रकार चला गया तो अन्य गांव से आये हुए लोगों ने दशरथ को घेर लिया और पूछने लगे कि क्या बात हुई। जब दशरथ ने बताया कि बात शुरु होने से पहले ही कलक्टर का संदेश आ गया और वह चला गया। 
वहां खडे एक आदमी ने कहा कि सरकार इस समय हर गांव के लिए फंड दे रही है कि गांव में काम पैदा करो ...लोगों से काम कराओ और उसकी मजदूरी दो। यह योजना आपके गांव के लिए भी आयी होगी। दशरथ झौरी और छेदी को इस बात को यकीन हुआ कि पत्रकार की मदद से अब गांव वालों के लिए वे कुछ कर सकेंगे। वे जल्दी से गलहौर के लिए रवाना हो गये।

दशरथ के घर की माली हालत भी अच्छी नहीं थी। बेटे के जलने के बाद पिजरी ने हाड खटा कर काम किया था मगर अब तक ठीक से अपने पैर पर खडी नहीं हो पाई थी। उसकी मिहनत की कमाई लिए गए कर्ज चुकाने में चली गई थी। बीच में बेटी होने के समय दो महीनो तक काम बन्द करना पडा था। पिछले दो साल से उसका काम भी काफ़ी कम हो गया था, जब फ़सल ही नहीं हुई तो कुटाई पिसाई कैसे हो। बडे घर की औरते अपनी कुटाई पिसाई खुद करने लगी थी। दशरथ के मना करने के बाद भी वह हाथ आए काम को छोडना नहीं चाहती थी। दोपहर बाद काम पर जाने के लिए तैयार हो गई। रमिया भाभी ने देह छूकर देखा, बुखार उतर गया था इस लिए उसे भी कोई आपत्ति नही हुई। पिंजरी का ऐसा व्यवहार है कि ऐसे हालात में भी उसे काम मिल जाता है, वरना काम कौन देता है आज कल।

पिंजरी और रमिया गांव के बबूआन टोल में पहुंची तो देखा कि जितिया गमछा पसार कर भीख मांग रहा है। देख कर पिंजरी और रमिया की आंख भर आई। जितिया का भरा पुरा परिवार था । भले ही उसके नाती पोते अलग अलग थे मगर वे दोनो जून जितिया को आदर के साथ खाना देते थे। मगर अब तो हालत ही कुछ और थे। बडे लोगों के टोले मे जितिया को भीख मांगने पर मजबूर होना पडा था। जितिया पता नहीं क्यो पिजरी और रमिया को जाते हुए बडे गौर से निहार रहा था।

झिंगुरी सिंह के घर रमिया के साथ पिंजरी ढेके पर बैठी धान कूट रही थी। अक्सर जब वे ढेके पर बैठती तो गीत गाना शुरू कर देती। गीतों के बीच आपसी चुहूल इस कदर परवान चढ़ती कि कब काम पूरा हो जाता उन्हे इसका पता भी नही चलता। आज उनके होठो पर कोई भी गीत नहीं था। उनके क्या पूरे गलहौर में सबकी जुबान से गीत और सबके चेहरे की खुशी गायब हो गई थी। रमिया और पिंजरी की चावल पर बस एक सधी हुई नजर थी। कई दिनों के बाद आज काम मिला था। पहले छह पसेरी में एक पसेरी मिलता था मगर आज एक जुन का भी मिल जाय तो वे ना नहीं कहेंगी। उनके सधे हुए पांव ढेके के लतमरूआ पर जाते, नीचे की ओर दबाव बनाते, ढेके का मुसल वाला सिरा उपर की ओर उठता, पैरों का दबाव कम हो जाता और मूसल धान पर गिरता। थोड़ा सा चावल बिखर जाता जिसे हर कुछ देर के बाद पिंजरी या तो रमिया जाकर ठीक कर देती । रमिया ने पिंजरी की ओर देखा तो वह बात समझ कर ढेका से नीचे उतर गई...।ओखल के पास बिखरे हुए चावलों को एकत्रित करके ओखल के बीच में कर दिया और एक नजर अपनी डेढ़ साल की बच्ची पर डाला जो आंगन में सो रही थी।

पिंजरी जब काम पर जाती बच्ची को भी ले जाती आंगन में बोरा डाल बच्ची को दूध पिलाती । उसका दूध पीते हुए बच्ची सो जाती । सो जाने के बाद उसे गमछे से ढक देती और उसके बाद वह अपना काम पूरा करने चली जाती । बच्ची बीच में कभी जागती तो वे गोद में ले लेती मगर ऐसा बहुत कम ही होता क्योकि एक बार दूध पी लेने के बाद पूरे चार पांच घंटे तक सोती ।बच्ची पर एक नजर डाल पिंजरी रमिया के पास चली गई और ढेके पर बैठ गई। उसने रमिया की ओर एक नजर देखा और कहा
अब चावल बहुत जल्दी हो जाएगा।
रमिया ने उसकी बातों का कोई जबाब नहीं दिया और मशीन की तरह काम करती रही । एका एक रमिया के मन में जाने क्या आया और उसने पिंजरी से पूछा
कितना चावल होगा तुम्हारे घर?
पिंजरी ने ठंढी निगाहों से रमिया को देखा उसके चेहरे पर जरा सा उत्साह नहीं था। उसने कहा
बस एक टिन बचा रह गया है।
पिंजरी को याद आया कि चावल तो वह कोठिला में रखती थी और हमेशा इतना रहता था कि एक दो साल का खर्च चल जाय मगर बेटे की बीमारी में कर्जा चुकाने में कुछ भी नहीं हो सका और सिर पर ये आफत आ गई। थोड़ी सी बात चीत के बाद दोनों खामेाश हो गए । झिंगुरी सिंह की बहू ससुराल गई थी और उनकी पत्नी दूसरे कमरे में बैठी गाय के दूध को बिलोकर मट्ठा निकाल रही थी ।इधर पिंजरी और रमिया अपने काम में मसगुल थे । रमिया ने ओखल के चावल पर एक नज़र डाल कर कहा
अब फटक लेते हैं।
पिंजरी ने कहा
दो चार मुसर और गिर जाने दो, चावल में चमक आ जाएगी।
और वे अपना काम जारी रखते हुए कुछ सोचते रहे ।

एकाएक दोनों की नजर सामने गई और वे कुछ समझ नहीं पायी । जितिया माझी बिजली की तेजी से आंगन में समाया ,एक पल के लिए नज़र घुमाकर उचक्के की तरह चारो ओर देखा। एका एक उसकी नजर आंगन में  सोयी पिंजरी की बच्ची पर टिक गई। मन ही मन उसने कुछ फ़ैसला लिया। बच्ची को एक हाथ से बिजली की गति से उठाया और आगे बढ़ता हुआ ढेके तक आ गया। ढेके का मूसल ज्योहि उपर उठा उसने बच्ची को ओखल में डाल दिया । सबकुछ इतना जल्दी और इस तरह पलक झपकते हुआ कि पिंजरी के मुंह से बस एक घूटी सी चीख निकली और दोनो अपनी जगह पर जैसे काठ हो गई।

ओखल में पड़ी पिंजरी की नन्ही सी बच्ची जोर जोर से रो रही थी और जितिया ओखल का चावल हाथ से निकालकर कभी गमछे मे डालता, कभी मुंह में और पागलों की तरह हंसता । पिंजरी और रमिया के पांव ढेंकी के लतमरुआ पर जोर से जमे थे, कही जरा सी चूक हुई तो इतने भारी ढेके का इतना बड़ा मूसल बच्ची के उपर जा गिरेगा ।रमिया और पिंजरी दोनों के चेहरे उड़ गए थे और वे समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे ।दूसरी ओर जितिया अब भी चावल गमछे में उठा रहा था, फाक रहा था और कहकहे लगा रहा था। बच्ची के रोने और उसके कहेकहे की आवाज सुन कमरे में दूध बिलोती झिंगुरी सिंह की पत्नी बाहर निकलकर आयी और सामने का दृष्य देखकर उनके मुंह से चीख निकल गई। जितिया ने उन्हे चीखते देखा तो उसके चेहरे पर भय की लकीरे दौड़ गयी और उसी तरह कभी चावल फाकता, कभी हंसता जितिया तेजी के साथ घर से बाहर निकल गय। झिंगुरी सिंह की पत्नी अब शोर मचाते हुए  जितिया के पीछे भागती चली गई ।पिंजरी को जैसे काठ मार गया था। उसके पांव अब भी ढेके के लतमरूआ पर पूरे ताकत से जमे थे।
रमिया ने उससे कहा-जाओ पहले बच्ची को उठाओ
मगर पिंजरी को जैसे सुनाई ही नहीं पड़ा। वह डर रही थी कि कही नीचे उतरी, दबाव कम पड़ा और बच्ची के उपर मुसल गिरा तो क्या होगा। उसकी हालत रोने रोने जैसी हो गई।रमिया ने ज़ोर दे कर कहा 
जाओ, मेरा यकीन करो
कई बार उसने कहा तो पिंजरी ने पहले अपना एक पांव हटाया । वजन का अनुमान किया । ढेके का मूसल अब भी उपर की तरफ टंगा था। उसे अब यकीन हो रहा था कि रमिया पूरा वजन सम्भाल लेगी तो डरते डरते दूसरा पांव हटाया और झपटकर रोती हुई बच्ची को ओखल के भीतर से निकाल सीने से चिपका लिया। बच्ची अब भी जार बेजार रो रही थी। आहिस्ता से मुसल गिराकर रमिया भी उसके पास आ गई। बच्ची को सलामत देख राहत की सांस ली तभी उन्हें जोरो की चीख सुनाई पडी और वे बाहर निकल गई।

बाहर निकलने के बाद उनलोगों ने जो कुछ देखा वह दिल को दहला देने वाला था। जितिया माझी उसी तरह गमछे से कच्चा चावल निकाल मुंह मे फाकता, अट्ठहास करता भाग रहा था और उसके पीछे गांव के आठ दस लोग लाठी लेकर भाग रहे थे। अंततः जितिया माझी गिर गया और उसके उपर लाठियों की बरसात होने लगी। सबसे आश्चर्यजनक बात थी कि लाठियो का प्रहार उसपर लगातार हो रहा था मगर वह उससे जरा भी विचलित हुए बिना गमछे की झोली से चावल मुंह में डाल रहा था और इस तरह हंस रहा था जैसे पेट भरने की खुशी मौत के गम से बहुत बडी हो। उसके शरीर मे कई जगह से खून रिस रहा था मगर वह पूरा चावल खा जाना चाहता था। आखिरी मुट्ठी मुंह में जाने के ठीक पहले उसके सिर पर लाठी का जोरदार वार हुआ, उससे भभक कर खून गिरने लगा और जब मुट्ठी का चावल उसके मुंह मे गया, पूरी तरह खून से सन चुका था। जितिया मर गया मगर देखने से ऐसा लगता था जैसे मरने से पहले भरपेट चावल खा लेने का संतोष उसके चेहरे पर था। यह दृष्य देखकर पिजरी और रमिया कांप गई और मुंह में आंचल ठुसकर सुबकते हुए माझी टोल की ओर भागी।

पिंजरी घर आई तो देखा कि दशरथ ब्लाक से आ चुके थे। दशरथ को यह जानकर संतोष हुआ था कि पिंजरी का बुखार उतार चुका है, मगर काम पर जाने से नाराज़ थे। पिंजरी ने रोते हुए जितिया के बारे में बताया तो दशरथ कांप गये मगर कुछ नही कहा। मौत की आरही अनगिन सूचनाओं की तरह ये भी महज एक सूचना थी। किसी की मौत पर रोने से ज़्यादा ज़रुरी था ज़िन्दा लोगों को मौत के मुंह में जाने से रोकना। दशरथ के आने की खबर सुन गांव के लोग आ गये। दशरथ ने बताया कि एक नयी योजना आयी है  कल उसके बारे में पता चल जाएगा। यह बात सुनकर पूरे गांव के गरीबों के बीच उत्साह के एक लहर दौड़ गई। सभी दशरथ की प्रशंसा  करने लगे। सबको इस बात का यकीन हो गया कि ऐसे कठिन समय में अगर कोई गांव को बचा सकता है तो वे दशरथ ही हो सकते है। मुखिया और अन्य किसी को गांव के गरीबो की कोई परवाह नहीं है

अगले दिन जब दशरथ ब्लाक पर जाने की तैयारी मे थे पिंजरी को बुखार आ गया।पिंजरी को कही न जाने की हिदायत देकर दशरथ ब्लाक के लिए गांव वालों के संग रवाना हो गये।

दशरथ निश्चित समय पर ब्लाक में पहुच गए । थोड़ी देर इंतजार के बाद पत्रकार आ गया। पत्रकार के साथ दशरथ बीडीओ के कमरे में गए। पता चला कि साहब दो घंटे बाद आएंगे। दो घंटे तक इंतज़ार के बाद दशरथ पत्रकार के साथ अंदर गए। इसबार बीडीओ का चेहरा गम्भीर था। उसने दशरथ को बाहर चले जाने को कहा। दशरथ ने सोचा हो सकता है कोई ऐसी गोपनिय बात हो जिसे मेरे सामने नहीं करना चाहते मगर जिस तरह से पत्रकार उनका साथ दे रहा था उनके भीतर पूरी उम्मीद थी और वे बाहर पत्रकार का इंतजार करने लगे। कुछ देर बाद पत्रकार लौटकर दशरथ के पास आया। दशरथ तेजी से आगे बढ़कर बोल पड़े का हुआ ।
पत्रकार एकाएक उनकी बातों का जबाब नहीं दे सका
दशरथ को लगा जरूर कोई ऐसी बात है जो उनके लिए अच्छी नहीं है। राजबरन भी साथ में आया था वह बोल पड़ा
कुछ गड़बड़ तो नही हो गया...पत्रकार साहेब....
हां गडबड तो हो गया है
सुनकर सबकी आंखे फटी रह गई चेहरे का रंग उड़ गया
क्या हो गया?
आपके गांव के लिए चार हजार रूपये आए थे। उसे गांव में ही किसी काम का सृजन कर मजदूरों के बीच बांटना था। मगर वे खतम हो चुके हैं ।
दशरथ ने पूछा-कैसे खतम हो गये ? किसी और गांव में दे दिया क्या?
नही, उसे आपके ही मुखिया जी ने निकलवा लिया है और वहां इस तरह के कगाजात अंगूठे के निशान के साथ पेश किए जा चुके हैं कि वह पैसा गांव के मजदूरों के बीच बाट दिया गया।
यह सुन कर सबकी भौहें तन गई।
मगर काम तो कुछ हुआ नही।
यही तो मेरे लिए भी सबसे ज्यादा चौकाने वाली बात है। ये पैसा देने के लिए जिस काम का विवरण दिया गया है वह काम कोई और नहीं आपके द्वारा की गई पहाड़ की कटाई है।
गांव के लोग सन्नाटे में आ गये। दशरथ चकित थे। अपना खून पसीना एक कर दशरथ ने जिस पहाड़ को काटा था उसी के नाम पर मुखिया चार हजार रूपये हड़प लिए। दशरथ ने पूछा
अब क्या हो सकता है।
आप चिन्ता मत कीजिए मैं इसे अखबार में लिखूंगा और मुखिया को वह पैसा वापस करना पडेगा।
पत्रकार ने इसका उपाय तो बताया मगर सबके चेहरे पर जो उम्मीद की लकीर खीची थी वह धूंधली पड़ गई। राजबरन पासी इतना उतेजित हो गया कि वही पर चिल्ला चिल्ला कर मुखिया को गाली बकने लगा । तय हुआ कि गांव चलकर मुखिया से इस बात की पड़ताल कि जाय और किसी तरह उससे ये पैसा निकलवा जाय ताकि मजदूरो को उनको परिवारो को इस अकाल में बचाया जा सके।

 जीतिया की मौत का सबसे अधिक प्रभाव किसी पर पडा था तो वह थी पिंजरी। उसके मन में बुरी तरह भय समा गया था। उसे बुखार था, रमिया भाभी ने मना किया कि बाहर मत जाओ मगर वह नही मानी। गांव में पंडिजी की बहू को तेल लगाने चली गई। दरअसल पिंजरी की कमाई के कई अतिरिक्त साधन बेटे के जलने के बाद विकसित हो गए थे। किसी के कंडे थाप देती, किसी के बच्चे की मालिस करती और कुछ न कुछ वहां से मिल जाता । उसे मालुम था कि अकाल का असर सिर्फ उनलोगों पर है जो गरीब हैं। जिनके पास साल दो साल खाने के लिए सुरक्षित अन्न का भंडार नही है। दशरथ ने पिंजरी को बार बार मना किया था कि जब तक बुखार पूरी तरह उतर नहीं जाता तब तक कही मत जाना। मगर पिंजरी को दशरथ की बातों की कोई परवाह नहीं थी। उसने पूरी तत्परता से बच्चों और रमिया भाभी को समझा दिया कि भूखे मरने से काम करना अच्छा है। गांव में किसी को ढूढने पर भी काम नहीं मिलता, एक वही है जो किसी तरह बात करके काम खोज लेती है। माझी टोल में हहाकार मचा है। अब लोग घासो और पेड़ की पतियों पर टूट पड़े हैं। औरों का हाल क्या कहें, खुद रमिया की भी हालत खराब होने लगी थी। उसने पिंजरी को नही रोका।

पिंजरी पंडिजी की बहु को तेल लगा कर आ गई मगर वहां उसे कुछ नही मिला। उसने किसी से कुछ नहीं कहा मगर चलते हुए उसके पांव कांप रहे थे, चक्कर आ रहा था। एक बार ऐसा लगा जैसे चलते चलते गिर जाएगी । वह इस बात से बेहद निराश थी कि अब गांव में कोई काम नहीं मिलेगा। पता नही कैसे गुजारा होगा।

घर लौट कर आई तो याद आया कि दशरथ सुबह में बिना कुछ खाए ब्लाक पर गया है। आज वह इसी लिए काम पर गई थी कि जो कुछ मिलेगा उसे ही पकाएगी मगर कुछ मिला नही। उसने एक मोटरी में चावल बांधकर धरन के उपर छूपाकर रखा था कि मुसिबत के दिनों मे काम आएंगे। जिस दिन उसने ये चावल उपर रखा था, उसी समय पता नहीं कैसे उसके मन में यह ख्याल आया कि जिस दिन ये चावल खतम हो जाएगे वह भी नहीं बचेगी। इस चावल से घर में चार लोगों का भोजन दस दिन तक तो चलेगा ही इसके बाद जो होगा देखा जाएगा। आदमी के बस में जो हो वही तो कर सकता है।दशरथ की बातों से उसे एक उम्मीद बध गई थी कि ब्लक वाला पैसा मिल जाए तो कुछ राहत होगी ।

उसने चावल की हाड़ी थाल में उलटी तो चावल एक दिन से ज्यादा का नहीं था। पिंजरी ने सोंचा कि धरन पर रखे गये चावल में से दो तीन दिन खाने भर चावल निकाल कर हाडी मे रख लें। खटिया पर चढ कर घरन पर देखा तो उसके होश उड़ गए । वहां चावल की मोटरी ही नही थी। इसका मतलब क्या हो सकता है। अभी तो इतना ज्यादा चावल था कि दस दिनो तक वह अपने पूरे परिवार को खिला सकती थी। अभी तीन दिन पहले धनिया भाभी रो रही थी कि उनके पास एक जून का चावल नही है और उसके बाद अकाल में भी जब पूरा गांव एक बेर खाकर जिन्दा है, कहां से दूनो बेर चावल बना रही हैं। वह समझ गई कि ये काम और किसी का नहीं धनिया भाभी का है। मगर वह कुछ कह भी नहीं सकती थी इस ख्याल मात्र से ही उसे चक्कर सा आ गया कि कल सुबह क्या बनेगा । क्या खिलाउंगी दशरथ और बच्चों को। पिछले कई दिनों से उसने अपनी खुराक में कटौती कर ली थी और आधा पेट ही खाती थी। उपर से कम्बख्त बुखार रोज आ ही जाता था। वह समझ नही पाई कि क्या करे। तभी दशरथ ब्लाक से लौट कर आ गए और जब उसे पता चला कि मुखिया ने वो सारे पैसे हड़प् लिए है तो रही सही उसकी उम्मीद भी समाप्त हो गई। राजबरन पासी ने पूरे गांव को यह बात फेला दी कि मुखिया हमारे पैसे हड़प गया है पूरे गांव की भीड़ दशरथ की दरवाजे पर आ गई  । दशरथ ने गौर किया कि आज पिंजरी कुछ अधिक परेशान है लेकिन गांव के लोगों का हुजूम इस तरह उतेजित था कि वे एक पल भी रूक नहीं सके और लोगों के साथ मुखिया से मिलने के लिए चले गए।

पिंजरी का दिल बहुत तेजी से बैठा जा रहा था। जब से अकाल शुरू हुआ था, लोग चावल को धोते नहीं थे । पहले तो पिंजरी  के घर से चावल पकने की गंध आती तो लोग बाहर बैठ जाते कि पिजरी बस माड़ दे देना और वह माड़ मे थोड़ा सा चावल मिलाकर दे देती।
कुछ दिनों के बाद हालत ये हो गई कि चावल का धोवन मांगने के लिए भी लोग आकर दरवाज़े पर बैठ जाते ।अब तक जिन हलातो से गुजरते वह गांव के लोगों को देख रही थी, क्या उसे भी उन्हीं हलातो से गुजरना पड़ेगा। जब चावल को चूल्हे पर चढ़ा दिया और खाली हड़िया को देखा तो अजीब सी कसक उसके भीतर उठी। उसके मन मे गहरी निराशा भर गई। चावल का माड़ निकाला और किसी दिब्य वस्तु की तरह उसे संजो कर रख दिया क्योकि आज घर मे सबकेा माड़ भात ही खाना होगा। रोज कही न कही से साग पात नोच ले आती थी और दशरथ के लिए बना देती थी मगर आज...। वह अपनी किस्मत पर रो पड़ी ।

दशरथ ने जिस तरह पिंजरी से वादा किया था कि वह उसके लिए पहाड़ काट कर रास्ता बना देगा उसी तरह उसने भी दशरथ से वादा किया था कि चाहे जो हो जाए, इस परिवार का बोझ तुम पर नही आने दूंगी।यह सोंच कर उसकी आंख भर आई कि अब कल क्या होगा। बार बार उसके जेहन में जितिया बाबा की मौत का चित्र उपस्थित हो जाता । उसके सिर का चक्कर बहुत तेज होता जा रहा था। रोज वह बच्चो को थोड़ा देर से खिलाती थी, महज इस लिए कि   रोज वे चार बार खाते थे अब तीन बार खाने लगे थे। बच्चों को बुलाकर खिला दिया और चावल देखा तो बस दशरथ के खाने भर था कमरे में ले गई और छिपाकर रख दिया। चुप चाप बैठ गई । लड़का खा लेने के बाद दौड़ता हुआ आया और पिंजरी से चिपक गया। दूसरे पल अलग हुआ
अरे मां तुमको तो बुखार है। देह भाथी जैसा जल रहा है।
पिंजरी को बुखार की जरा भी परवाह नहीं थी । उसके सिर का चक्कर और तेज हो गया। लगा कि पूरा छप्पर गोल गोल घुमकर नाच रहा है। मन जाने कैसा तो होने लगा। वह जाकर बिस्तर पर लेट गई और बुधुआ से रमिया भाभी को बुलाने के लिए कहा । बुधुआ दौड़ा दौड़ा गया तो रमिया आ गई। रमिया के आने के बाद पिंजरी अपने आप पर काबू नहीं रख सकी और रो पड़ी।
रमिया ने उसका हाल देखा और हतप्रभ रह गई। महज दो घंटों में पिंजरी की आंखो के नीचे काला गड्ढा पड़ गया था और चेहरा पूरा पीला पड गया था। वह पिजरी थी ही नहीं जिसे रमिया भाभी ने सुबह तक देखा था।
अरे का हो गया तुमको ।
रमिया तेजी से आगे बढी और पिंजरी का माथा छू लिया
अरे बाप देह मे तो जैसे आग लगी हुई है।
उसने बुधुआ से कहा
पानी ले आ
बुधुआ जल्दी से पानी ले आया और रमिया अपना आंचल भीगाकर उसके सिर के आस पास पोछने लगी ताकि उसका बुखार उतर जाय । डेढ़ साल की बच्ची उसकी बगल में सो रही थी।सनिचरी से रमिया ने पांव का तलवा सहलाने और बुधुआ को मुखिया के पास जाकर दशरथ को बुलाने को कहा। बुधुआ तेजी से दौड़ता बाहर निकल गया।
पिंजरी की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी और रमिया समझ नही पा रही थी कि क्या करे। पिंजरी ने जैसे कराहते हुए कहा
दशरथ को बुलवा दो दीदी...
रमिया ने कहा
घबरा मत बुधुवा गया है... आता ही होगा दशरथ
मगर पिंजरी ने नही सुना। अपनी रौ में दशरथ को बुलवा दो दीदी... कहती रही और एकाएक बेहोश हो गई। बेहोशी में भी लगातार दशरथ दशरथ बड़ बड़ा रही थी। रमिया भाभी ने देखा कि पिंजरी के दांत चढ गये हैं। तुरत उसने पिंजरी के कान में मुंह लगा कर फ़ूक मारना आरम्भ किया। तीसरे फ़ूक के बाद पिजरी का मुंह भक से खुल गया और वह होश में आ गयी। होश में आते ही पूछा
दशरथ आया कि नही।
रमिया ने कहा
आ जाएगा, जल्दी आ जाएगा... तु चिन्ता मत कर
पिंजरी की आंख से आंसू की एक रेखा अविरल प्रवाहित होने लगी।
नही आएगा दीदी...
आएगा ज़रुर आएगा।
पिंजरी ने रमिया का हाथ पकड लिया और कहा
दीदी दशरथ के लिए खाना बनाकर रख दिया है आए तो जरूर खिला देना । इतना काम जरूर कीजिएगा ।
इतना कहने के बाद पिंजरी लम्बी सांस लेने लगी।
दीदी...आप से कहा था न मैने, जिस दिन मेरे हाड़ी का चावल खतम हो जाएगा उस दिन मैं जिन्दा नही बचुंगी । हांडी का चावल खतम हो गया है दीदी...
रमिया समझ रही थी कि पिंजरी की आवाज में गति नहीं थी एक ठहराव था वह बहुत सम्भल सम्भलकर बोल रही थी ।
जो बनाकर रखा है खिला देंगी न...मेरे दशरथ को
जिस वक्त अपने जीवन की पूरी विकलता के साथ पिंजरी यह बात रमिया से कह रही थी दशरथ पीछे आकर खड़ा हो गया था।
रमिया ने कहा
हा हा खिला दूगी । तू घबराती क्यो है सब ठीक हो जाएगा।
अचानक उसकी नज़र दशरथ पर पडी
देख तेरा दशरथ आ गया । आ दशरथ तू ही समझा इसे ।
सामने के दृष्य देखकर दशरथ की आंखे भर आयी थी वह सीधे पिंजरी के सिरहाने आ गया और उसके सिर को अपनी गोद में ले लिया ।
तू काहे घबराती है रे सब ठीक हो जाएगा।
दशरथ के गोद में सिर रखे पिंजरी ने दशरथ को देखा। हल्के से मुस्काई और एक टक उसे ऐसे देखते रही जैसे आखिरी बार देख रही हो ।
दशरथ से रहा नहीं गया बोल पड़े ।
काहे परेशान होती हो सब ठीक हो जाएगा।
इस बार पिंजरी के भीतर जाने कहा से ताकत फुट पड़ी
अब कुछ ठीक नहीं होगा दशरथ ...
पिंजरी के हाथ दशरथ के पैरो की ओर बढ गये
मुझे माफ कर देना... दशरथ, मैं अपना वादा नहीं निभा पायी। बहुत कोशिश की निभाने की... मगर हार गई
इस बार उसने रमिया भाभी की ओर देखा
भाभी हड़िए मे भात रखा है और कटोरे में माड... अब कभी दशरथ के लिए खाना बनाने नही आऊंगी... मेरे हाथ का बना आखिरी खाना दशरथ को जरूर खिला देना ।
खिला दूंगी
कह कर रमिया भाभी रोने लगी।
इसके बाद पिंजरी की आंखे किसी और दिशा मे मुड़ी और उसने दशरथ की गोद मे दम तोड़ दिया।

पिंजरी की मौत की खबर पूरे गांव में पसर गई। देखते देखते पिंजरी को देखने के लिए गांव के लोगों की भींड लग गई। लोग जब वहां पहुंचे तो देखा कि बरामदे में ढेंकी के समानान्तर पिंजरी की लाश पडी है। लाश से लिपट कर बुधुवा और शनिचरी रो रहे हैं। पिंजरी की डेढ साल की बच्ची रमिया भाभी की गोद में है और दशरथ पिंजरी की लाश के बगल में बैठे उसके हाथ का बना माड और भात इस तरह खा रहे थे जैसे और कोई नही पिंजरी उन्हे बैठ कर खिला रही हो... इधर बाहर कोई चिल्ला रहा था कि गांव के माझी टोल के लोग मुखिया के घर को लुट रहे है।









Sunday, September 11, 2011

मॆं भूल नही सकता

मॆं भूल नही सकता

उन निगाहों को

इस जन्म के पार

अगले कई कई जन्मों तक

बला की खूबसूरत

पहाडी नदी सी बदहवास

उमर महज बीस या बाईस साल

भागती जाने कहां से आई..जाने क्या देखा

ऒर रूक गई मेरे पास

जरा भी नहीं किया ईंतजार

जरा भी नही किया परवाह

अपने ही आंचल में लगाया हाथ ऒर

दुनिया की सबसे खूबसूरत गाय के थन सा

अपना स्तन निकाल कहने लगी

जल्दी से मेरा दूध पी लो

मुझे दूध बहुत होता हॆ

जहां मॆ खडा था

अस्पताल के ठीक बाहर का चॊराहा था

मरीजो से मिलने का वक्त था..लोग अधिक न थे

तो कम भी नही थे..सारी दुकानें खुली थी

ऒर उसे किसी की परवाह ही नही थी

मुझे संशय मे देख तमतमा गई

जल्दी करो..

मेरी छाती फ़ट रही हॆ..

जरा ऒर देर हुई तो जड दिया तमाचा..

लगा बच्चे की तरह खींच कर मुंह मे डाल देगी

तभी अस्पताल के गेट से

दो लोग निकले..एक जो उसका पति था..

समझा कर ले जाने लगा..तब भी उसकी आंखे

मुझ पर ही गडी थी..गिड्गिडाते हुए रो रोकर कह रही थी

सुनो..

मेरा दूध पी लो..

मुझे दूध बहुत होता हॆ

मॆंने देखा..उसका आंचल दूध से भींग गया था

चली गई तो कहने लगा दूसरा

माफ़ी चाहता हूं भाई साहब

ठीक नही हॆ उसकी दिमागी हालत..दो दिन पहले

हुआ था बच्चा..इसी अस्पताल मे..किसी ने चुरा लिया

अब तक नही मिला कोई सुराग ऒर चला गया

जाते जाते

जिस तरह देखा था उसने मुझे

मॆं भूल नही सकता..उन निगाहों को

इस जन्म के पार..अगले कई कई जन्मों तक

Thursday, June 23, 2011

दिल्ली के लादेन जी


लेन जी

देन जी

दिल्ली के लादेन जी


पाकिस्तान के नेता जॆसे

लड्ते आतंकवाद से

वॆसे लड्ते हिन्द के नेता

देश मे भ्रस्टाचार से


दूध नही

फ़ेन जी

दिल्ली के लादेन जी


माल छुपाया स्वीस बॆंक मे

ऒर सबको भरमाया

121 करोड़ के देश मे बोलो

अब तक कितना खाया


अब ना चढेगी

काठ की हाडी

एन केन प्रकारेन जी